सिद्ध करो काज ... हे गणराज !
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्य समप्रभ !
निर्विघ्नम कुरुमे देव शुभ कार्येषु सर्वदा !!
-----------------------------------------------------
एक प्रयास दिल् के कुछ विचारों को
पंक्तियों में उतारकर आपके जायके के
लिये प्रस्तुत करने का आशा है आपको पसंद आये !
आपके स्नेहाशीष का प्यासा ----- महेशचंद खत्री .
No comments:
Post a Comment